सिंधु घाटी सभ्यता 2022

सिंधु घाटी सभ्यता दक्षिण एशिया में पहली प्रमुख सभ्यता थी, जो वर्तमान में भारत और पाकिस्तान (लगभग 12 लाख वर्ग किमी) में भूमि के विशाल क्षेत्र में फैली हुई थी।

आभास से सिंधु घाटी सभ्यता की समय अवधि बीसी के बीच अनुमानित है। 2700- बीसी .1900 यानी। 800 साल के लिए। लेकिन प्रारंभिक सिंधु घाटी सभ्यता बीसी 2700 से पहले भी मौजूद थी।

सिंधु घाटी सभ्यता
सिंधु घाटी सभ्यता

हालाँकि इतिहास के जानकारों मैं इसका काफी भेदभाब मिलता है जैसे

माधोस्वरूप वत्स – 3500 – 2700 ई० पू०।

जॉन मार्शल – 3250 – 2750 ई० पू०।

मार्टीमर व्हीलर – 2500 – 1500 ई० पू०।

फ़ेयर सर्विस – 2000 – 1500 ई० पू०।

अर्नेस्ट मैके – 2800 – 2500 ई० पू०।

डी० पी० अग्रवाल – 2300 – 1750 ई० पू०।

जी० सी० गैड – 2350 – 1750 ई० पू०।

मगर जो सर्व मान्य है वो है कार्बन डेटिंग से निकला गया समय | और वो है 2300 – 1750 BC. और अगर किसी भी परीक्षा मैं आपसे पुछा जाता है तो आपको ये ही बताना है |

सिंधु घाटी सभ्यता की विशेषताएं

” सिंधु घाटी सभ्यता की विशेषताएं ” सिंधु घाटी के लोग, जिन्हें हड़प्पा के नाम से भी जाना जाता है (पुरातत्वविदों द्वारा पाया गया क्षेत्र में हड़प्पा पहला शहर था), ने प्रौद्योगिकी में कई उल्लेखनीय प्रगति हासिल की, जिसमें लंबाई और द्रव्यमान मापने के लिए उनके सिस्टम और उपकरणों में बड़ी सटीकता शामिल है।

हड़प्पा के लोग एक समान बाट और माप की एक प्रणाली विकसित करने वाले पहले लोगों में से थे जो क्रमिक पैमाने के अनुरूप थे। सबसे छोटा विभाजन, लगभग 1.6 मिमी, हाथी दांत के पैमाने पर चिह्नित किया गया था, जो लोथल में पाया गया था, जो कि सिंधु घाटी का एक प्रमुख शहर है।


सिंधु घाटी सभ्यता की विशेषताएं

  • सिंधु नदी की घाटियों पर शहर बसे हुए हैं |
  • हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।
  • शहरी जीवन की शुरुआत।
  • हड़प्पा स्थलों की खोज – दयाराम साहनी (1921) – मोंटगोमरी जिला, पंजाब,पाकिस्तान द्वारा की गई।
  • मोहनजोदड़ो की खोज – आर डी बनर्जी – लरकाना जिला, सिंध, पाकिस्तान ने की थी।
  • शहर को गढ़ (पश्चिम) और निचला शहर (पूर्व) में विभाजित किया गया था।
  • लाल मिट्टी के बर्तनों को काले रंग से डिजाइन किया गया है।
  • पत्थर के बाट, मुहरें, विशेष मनके, तांबे के औजार, लंबे पत्थर के ब्लेड आदि।
  • तांबा, कांस्य, चांदी, सोना मौजूद है।
  • कृत्रिम रूप से उत्पादित – फैयेंस।
  • हस्तशिल्प के विशेषज्ञ।
  • कच्चे माल का आयात।
  • हल का प्रयोग किया जाता था।
  • शवों को लकड़ी के ताबूतों में दफनाया गया था, लेकिन बाद के चरणों में ‘एच समरूपता संस्कृति’ विकसित हुई जहां शवों को चित्रित दफन कलशों में दफनाया गया।
  • गन्ने की खेती नहीं, घोड़ा, लोहे का नहीं हुआ इस्तेमाल।

सैन्धव समाज तीन वर्गों में विभाजित था। विशिष्ट वर्ग, खुशहाल मध्यम वर्ग, अपेक्षाकृत कमजोर  वर्ग। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि दुर्ग में निवास करने वाले लोग पुरोहित वर्ग के थे।
नगर क्षेत्र में व्यापारी, अधिकारी, सैनिक एवं शिल्पी रहते थे। जबकि नगर के निचले हिस्से में अपेक्षाकृत कमजोर वर्ग जैसे- कृषक, कुम्भकार, बढ़ई, नाविक, सोनार, जुलाहे तथा श्रमिक रहते थे। हड़प्पा सभ्यता में सम्भवतः दास प्रथा प्रचलित थी।

सिन्धु घाटी के निवासी खाने पीने, वस्त्र एवं आभूषणों के शौकीन थे। आभूषण सोने, चाँदी एवं माणिक्य के बनाये जाते थे। हाथी दांत तथा शंख का उपयोग अलंकरण तथा चूड़ियां बनाने के लिए किया जाता था। दर्पण ताँबे के बने थे जबकि कंघियाँ और सुइयाँ हाथी दांत की बनी हुई थीं।

हड़प्पा से एक श्रृंगारदान मिला है तथा चन्हूदड़ो से एक अंजनशालिका तथा लिपिस्टिक प्राप्त हुई है। नौसारो से स्त्रियों की मांग में सिन्दूर लगाये जाने के साक्ष्य मिले हैं। हड़प्पा सभ्यता के लोग मनोरंजन के लिए पाँसे खेलना, शिकार तथा नृत्य आदि किया करते थे।

सिन्धु घाटी सभ्यता के महत्वपूरण तथ्य
सिन्धु घाटी सभ्यता के महत्वपूरण तथ्य

“sindhu ghati sabhyata in hindi” सबसे अधिक नारी मृण्मूर्तियां मिलने के कारण सैन्धव समाज मातृसत्तात्मक माना जाता है। परन्तु लोथल से तीन युगल शवाधान तथा कालीबंगा से एक युगल शवाधान मिला है जिससे अनुमान लगाया जाता है कि यहाँ सती प्रथा का प्रचलन था।

सिंधु सभ्यता का आर्थिक जीवन अत्यन्त विकसित अवस्था में था। आर्थिक जीवन के प्रमुख आधार कृषि, पशुपालन, शिल्प और व्यापार थे।

सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रतिवर्ष लायी गयी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी कृषि कार्य हेतु महत्वपूर्ण मानी जाती थी। इस उपजाऊ मैदान में मुख्य रूप से गेहूं तथा जौ की खेती की जाती थी। हड़प्पाई लोगों को कुल 9 फसलें ज्ञात थी। जौ की दो किस्में, गेहूं की तीन किस्में, कपास , खजूर, तरबूज, मटर, राई, सरसों और तिल।

कालीबंगा से “जुते हुए खेत” के साक्ष्य मिले हैं। मोहनजोदड़ो तथा बनवाली से मिट्टी के हल के खिलौने मिले हैं। कृषि कार्य के लिये सम्भवतः नदियों का जल, वर्षा का जल व कुँओं का उपयोग किया जाता था। बनावली से बढ़िया किस्म का जौ प्राप्त हुआ है। लोथल से चावल के अवशेष तथा रंगपुर से धान की भूसी प्राप्त हुई है।

हड़प्पाई लोग बहुत सारे पशु पालते थे। वे बैल, गाय, भैस, बकरी, भेड़, सुअर, कुत्ता, बिल्ली, गधे, ऊँट, गैंडे, बाघ, हिरन आदि से परिचित थे। उन्हें कूबड़ वाला सांड अधिक प्रिय था। हाथी और घोड़े पालने के साक्ष्य प्रमाणित नहीं हो सके हैं। परन्तु गुजरात के सुरकोटडा से घोड़े के अस्थिपंजर, राणाघुंडई से घोड़े के दाँत, लोथल से घोड़े की हड्डियां प्राप्त हुई। ऊंट की हड्डियां अनेक पुरास्थलों से बड़ी संख्या में पायी गयीं हैं। लेकिन किसी मुद्रा पर ऊँट का चित्र नहीं मिला है।

मेसोपोटामिया को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सूती वस्त्र सम्भवतः प्रमुख सामग्री थे।

हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त विशाल इमारतों से स्पष्ट है कि स्थापत्य महत्वपूर्ण शिल्प था। हड़प्पाई लोग नाव बनाने का कार्य भी करते थे। वे मिट्टी की मूर्तियां भी बनाते थे। मिट्टी के बर्तन बनाने का शिल्प अत्यन्त विकसित था।

हड़प्पा सभ्यता में पशुपति की पूजा प्रचलित थी। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर में तीन मुख्य वाला एक पुरुष ध्यान की मुद्रा में बैठा है। उसके सिर पर तीन सींग है। उसके दाहिने तरफ एक हाथी तथा एक बाघ और बायीं तरफ एक गैंडा और एक भैंसा खड़े हुए दिखाये गये हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि आज के भगवान शिव की पूजा उस समय पशुपति के रूप में होती थी।

sindhu ghati sabhyata in hindi
sindhu ghati ki sabhyata

सिन्धु घाटी सभ्यता के महत्वपूरण तथ्य

सामाजिक विशेषताएं:

  • सिंधु घाटी सभ्यता भारत में पहला शहरीकरण है।
  • इसमें एक सुनियोजित ड्रेनेज सिस्टम, ग्रिड पैटर्न और टाउन प्लानिंग है।
  • उनके पास समाज में समानता है।

आर्थिक तथ्य:-

  • सिंधु घाटी सभ्यता कृषि पर आधारित है।
  • इस काल में व्यापार और वाणिज्य का विकास हुआ।
  • लोथल में एक डॉकयार्ड मिला है।
  • निर्यात-आयात होते थे।
  • कपास का उत्पादन होता था।
  • लोथल में, हड़प्पा संस्कृति में मौजूद सत्य के वजन और माप देखे गए थे।
  • वजन और आमतौर पर आकार में घनाकार थे। और चूना पत्थर, स्टीटाइट, आदि से बने थे

धार्मिक तथ्य:-

  • मातृदेवी या शक्ति माता देवी हैं।
  • योनि पूजा और प्रकृति पूजा अस्तित्व में थी।
  • वे पीपल जैसे वृक्षों की पूजा करते थे।
  • उन्होंने हवन कुंड नामक अग्नि पूजा की भी पूजा की।
  • पशुपति महादेव को जानवरों के देवता के रूप में जाना जाता है।
  • सिंधु घाटी सभ्यता के लोग गेंडा और बैल की तरह पशु पूजा करते थे।

सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के कारण

हालांकि विभिन्न सिद्धांत हैं, सटीक कारण अभी भी अज्ञात है। IIT खड़गपुर और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, कमजोर मानसून सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण हो सकता है।

शहर के जीवन को बनाए रखने के लिए सिंधु घाटी के शासकों (केंद्रीय प्रशासन) की शक्ति के नुकसान के साथ पर्यावरणीय परिवर्तन, इसका कारण हो सकता है (फारिसर्विस थ्योरी)। जनसंख्या को बनाए रखने के लिए संसाधन की कमी हो सकती है, और फिर लोग इस ओर चले गए

मोहनजोदड़ो की खोज किसने की

राखलदास बनर्जी ने 1922 ई.

कालीबंगा कहाँ स्थित है

राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले

‘मोहनजोदड़ो’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?

मोहनजोदाड़ो को मृतकों या प्रेतों का टीला कहा जाता है

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